शिक्षा वह पूँजी है,जो किसी भी राष्ट्र का भविष्य तैयार करती है । खासकर भारत जैसे अतिजनसंख्य राष्ट्र में विकास की इबारत लिखने के लिए शिक्षा ही एक मात्र विकल्प है । लेकिन ये सभी बाते सिर्फ कहने और सुनने में ही अच्छी लगती हैं क्योंकि महाशक्ति बनने का छद्म दंभ भरता भारत दरअसल अनचाहे ही सही दो राष्ट्रों में विभक्त है । एक है 'भारत' और एक है 'इंडिया' । जहाँ असमानता की चौड़ी खाई स्पष्ट नजर आती है । एक तरफ तो संसाधनविहीन गरीब और पिछड़ा तबका है जो शिक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है क्योंकि गरीबी,भुखमरी और लाचारी उसको विद्यालय की चौखट पर जाने से रोक रही है । दूसरी तरफ सदियों से संपन्न पूंजीपतियों और उच्च जातियों के संपन्न घरानों के नौनिहाल है जो शिक्षा के हरेक माध्यम को बिना किसी संघर्ष के सुलभता से पा रहे हैं ।दृश्य बिहार के छोटे से गाँव का है जहाँ कक्षा दो में पढने वाला लिली नाम का मासूम,जो शिक्षा प्राप्ति हेतु अपनी पारिवारिक गरीबी के मध्य जूझकर भी चेहरे पर मुस्कान बिखेर रहा है । इस कठिन दौर में भी वह अपनी कर्मठता से विद्यालय के शिक्षकों का लाडला है ।पीठ पर लदी बीज के बोरी से निर्मित बस्ते में ही वह अपने भविष्य के सपनों को बुन रहा है । यही विभेद है भारत जैसे राष्ट्र का जहाँ एक लिली को शिक्षा प्राप्ति हेतु संघर्ष करना पड रहा है और कान्वेंट की दौड़ में स्वयं को अन्य धन्नासेठों के पुत्रों के समक्ष हीन भावना से ग्रसित पाता है । दरअसल यही है भारत और इंडिया का द्वन्द । जीडीपी के प्रतिशत रूप में भारत मात्र ३ प्रतिशत के अल्प खर्च से राष्ट्र को विश्वगुरु बनाने का ख्वाब पाले है,जबकि अन्तराष्ट्रीय मानक भी ५ प्रतिशत की अपेक्षा रखता है । दुनिया के टॉप २५ राष्ट्रों का शैक्षणिक जीडीपी प्रतिशत भी न्यूनतम ७ प्रतिशत का है,लेकिन जिओ की दौड़ में दौड़ते राष्ट्र को इस बात की अवश्य चिंता है कि कैसे प्रति व्यक्ति के हाथों में भुखमरी,लाचारी,बेरोजगारी और अशिक्षा के मध्य मुफ्त मोबाइल पकडाया जाय । शिक्षा के अधिकार की जगह देश में सबके हाथ मोबाइल,बेरोजगारी और लाचारी पकडाने कि यह कवायद देश के सुनहरे भविष्य के साथ एक खिलवाड़ ही तो है । सालाना पांच करोड़ के रोजगार के वादे,पांच साल में सबके लिए पक्के मकान,पंद्रह लाख के वादे के मध्य प्रधानमन्त्री जी का किसी पूंजीपति के विज्ञापन का मुख्य चेहरा बनना भारत को किस विकास की राह पर ले जा रहा है । इन सब वादों के मध्य जीडीपी में शिक्षा का प्रतिशत घटाकर,सालाना केंद्रीय सेवाओं में नौकरियों की संख्या में कटौती करके क्या हम एक समृद्ध भारत के निर्माण की दिशा में बढ़ रहे हैं ? लिली जैसे बच्चे संघर्ष की आंच में तपकर भी अपने चेहरे पर मुस्कान रखने का माद्दा रखते है,तो क्या हमारी कोई जिम्मेदारी नही बनती कि इन होनहारों को उनकी असली जगह पहुँचाया जाय । ऐसे मुद्दों पर राष्ट्र्चेतक बना मीडिया क्यों मौन है ? क्या छद्म राष्ट्रवाद की ढपोरशंखी यही है ?
प्रश्न यह नही कि दोष किसका है ? बल्कि प्रश्न यह है कि इस भुखमरी,लाचारी,बेरोजगारी और अशिक्षा के दलदल से भारत कब आजाद होगा ? कब तक समाज के शोषित तबके के हक़ और अधिकारों को छीनकर किसी अम्बानी और अदानी की झोली भरी जायेगी ? कब तक देश की आधी से अधिक आबादी खुली आसमानी छत के सहारे अपना जीवनयापन करती रहेगी ? आजादी के ७० वर्षों की समीक्षा में यदि आप सोचेंगे कि हमने क्या खोया,क्या पाया तो विश्वास
मानिए इस देश की तीन चौथाई आबादी में लिली जैसे मासूमो दिखेंगे,लेकिन सत्ता सदैव २ से ३ प्रतिशत अम्बानी और अदानी कि ख़ुशी के लिए इनके सपनों का गला घोटेगी ।
प्रश्न यह नही कि दोष किसका है ? बल्कि प्रश्न यह है कि इस भुखमरी,लाचारी,बेरोजगारी और अशिक्षा के दलदल से भारत कब आजाद होगा ? कब तक समाज के शोषित तबके के हक़ और अधिकारों को छीनकर किसी अम्बानी और अदानी की झोली भरी जायेगी ? कब तक देश की आधी से अधिक आबादी खुली आसमानी छत के सहारे अपना जीवनयापन करती रहेगी ? आजादी के ७० वर्षों की समीक्षा में यदि आप सोचेंगे कि हमने क्या खोया,क्या पाया तो विश्वास
मानिए इस देश की तीन चौथाई आबादी में लिली जैसे मासूमो दिखेंगे,लेकिन सत्ता सदैव २ से ३ प्रतिशत अम्बानी और अदानी कि ख़ुशी के लिए इनके सपनों का गला घोटेगी ।


यही विभेद है भारत जैसे राष्ट्र का जहाँ एक लिली को शिक्षा प्राप्ति हेतु संघर्ष करना पड रहा है और कान्वेंट की दौड़ में स्वयं को अन्य धन्नासेठों के पुत्रों के समक्ष हीन भावना से ग्रसित पाता है । दरअसल यही है भारत और इंडिया का द्वन्द । nice
ReplyDeleteबाकी जो है सो हइये है।
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