हक़ और हुक़ूक़ की लड़ाई तब तक अधूरी है,जब तक कि संसाधनों का सही बटवारा न हो,व्यवस्था की बेहतर समीक्षा न हो। वाकया उत्तर प्रदेश की माटी से है। पीसीएस प्रारंभिक परीक्षा २०१६ के नतीजे आते है और आरक्षण विरोधी धड़ा आरोप लगता है कि उक्त परीक्षा में त्रिस्तरीय आरक्षण लागू किया गया है। आनन-फानन में आयोग के हाथ-पाँव फूल जाते है और तत्काल आयोग के सचिव स्पष्टीकरण हेतु मीडिया के समक्ष प्रस्तुत होते है और त्रिस्तरीय आरक्षण के आरोप को सिरे से खारिज कर देते हैं। सिर्फ ५ से १० लोगों के आरक्षण विरोधी समूह का दबाव इतना अधिक है कि एक संवैधानिक संस्था के आईएएस रैंक के सचिव को सफाई देनी पड़ती है। जबकि दूसरी तरफ विगत ४ वर्षों से संघर्षरत हजारों आरक्षण समर्थकों को बूटों और लाठियों के दम पर कुचला जा रहा है। आखिर क्यों ?
बहरहाल कौन सही और कौन गलत है यह समझने से पूर्व त्रिस्तरीय आरक्षण शब्द की महिमा को जानना बेहद आवश्यक है। जिस त्रिस्तरीय आरक्षण के जिन्न को बारम्बार देश का अभिजात्य मीडिया और आरक्षण विरोधी जीवित करते हैं,आख़िरकार वो है क्या ?
दरअसल त्रिस्तरीय आरक्षण अभिजात्य और सवर्ण मीडिया द्वारा गढ़ी एक शब्दावली मात्र है,जो आरक्षण की मूल भावना पर चोट करता है। त्रिस्तरीय शब्द का प्रयोग करके अभिजात्य वर्ग वैमनस्य की राजनीति में संलिप्त है। असल में लोकसेवा आयोग,अधीनस्थ आयोग,माध्यमिक आयोग इत्यादि में आरक्षण के नियमों की ही तिलांजलि दी गई है। उक्त आयोगों को किसी भी परीक्षा की प्रक्रिया का निर्धारण और आयोजन का स्वतंत्र अधिकार प्राप्त है,ऐसे में परीक्षा को कितने चरणों में संपन्न कराना है,ये आयोग के स्वविवेक पर निर्भर है। लोकसेवा आयोग की पीसीएस जैसी परीक्षाएं तीन चरणों प्रारंभिक,मुख्य और साक्षात्कार में विभक्त है और इसमें आरक्षण के नाम पर अधिकारों का गलाघोटन होता है। वास्तव में आरक्षण प्रारंभिक स्तर पर मिलना चाहिए,जबकि ऐसा न करके इसको अंतिम स्तर पर साक्षात्कार के दौर में उपलब्ध कराया जाता है और ऐसे में ओबीसी,एससी,एसटी को उनका आरक्षण ही नहीं मिल पाता है।
आरक्षण शब्द मात्र से २०% सवर्णों की पेशानी पर बल पड़ने लगता है,लेकिन असल आरक्षण का लाभ तो वे ही उठा रहे हैं। मंदिरों,मठों,मीडिया,न्यायपालि का,विश्वविद्यालयों में उच्च से निम्न पदों तक लगभग १००% का एकाधिकार प्राप्त यह २०% जनसँख्या वाला तबका वहां के आरक्षण की समीक्षा से गुरेज करता है। ५००० वर्षों के शोषण की उपज स्वरुप कुछेक पिछड़े और दलित नेताओं का प्रादुर्भाव देश और प्रदेश की राजनीति में हुआ भी,लेकिन सब व्यर्थ साबित हुआ क्योंकि वे भी मनुवाद के सिरहाने बैठने में गर्व महसूस करते हैं।
बात उत्तर प्रदेश की है,तो यहाँ के ही कुछेक उदाहरण देना ज्यादा बेहतर होगा। त्रिस्तरीय आरक्षण के संघर्ष के दौर में जब समर्थक और और विरोधी अपने-अपने स्तर से लामबंद हुए उनके समर्थन में अनेक नेताओं ने अपने मत दर्ज कराये। उदाहरणस्वरुप आरक्षण विरोधियों के समर्थन में उत्तर प्रदेश की तथाकथित पिछड़ी सरकार के अनेक सवर्ण नेताओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी दर्ज कराई,जिनमे रेवती रमन सिंह,ओम प्रकाश सिंह,रंजना वाजपेयी इत्यादि थी,जो पिछड़ी और दलित बाहुल्य सीटों से चुन कर अपनी राजनैतिक पारियां खेल रहे हैं। दुखद पहलू तो यह था कि जब आरक्षण विरोधियों को अधिकार दिलाने की लड़ाई लड़ने एक पिछड़ा उपस्थित हो गया। उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष और सांसद केशव प्रसाद मौर्या उन महान हस्तियों में है जो आरक्षण प्राप्त तबके से ताल्लुक रखते है,परन्तु राजनीति की गन्दी चालों में खुद को विरोधी साबित कर गौरवान्वित होते हैं। उक्त सवर्ण नेताओं से ज्यादा दोषी तो वे नेता थे जिन्होंने खुद की राजनीति ही पिछड़ा और दलित को छल कर सदैव आबाद की है,इनमे मुलायम,मायावती,अखिलेश तो हैं ही,साथ ही साथ इनकी पार्टी के पिछड़े और दलित नेता भी। इनकी सरकारों के दौर में आरक्षण का हक़ पाने हेतु उत्तर प्रदेश की सड़कों पर लाठियों के दम पर पीटा जाना कितना न्यायसंगत है ?
आरक्षण का जिन्न बारम्बार उठाने वाली सवर्ण और खासकर ब्राह्मण आधिपत्य वाली आरएसएस को बिहार के चुनावों में एक पिछड़े सपूत लालू प्रसाद के हाथों मुंह की खानी पड़ी थी,लेकिन उन्ही के समकक्षीय नेतों मुलायम,नितीश,मायावती,रामबिलास पासवान शायद अपनी जाति और जिल्लत भुला चुके हैं। रामबिलास पासवान के सपूत चिराग के गैरजिम्मेदाराना बयान पासवान के
राजनीतिक चिराग को न बुझा दे क्योंकि स्वयं सुरक्षित सीटों की मलाई खाने वाले इन बाप-बेटों की आरक्षण छोड़ने की नसीहत भविष्य में भारी पड़ सकती है।
अंततः यही कहूंगा कि २०% के हक़ के बदले ८०% के अधिकारों का दमन करने वाली इन तथाकथित सरकारों को खुद के गिरेबां में झाकने की जरुरत है,वरना यदि किसी दिन उनके स्वजातियों ने ही उनका साथ छोड़ दिया तो साउथ एवेन्यू और कालिदास मार्ग दूर की कौड़ी हो जाएगी।
बाकी जो है सो हइये है।
बहरहाल कौन सही और कौन गलत है यह समझने से पूर्व त्रिस्तरीय आरक्षण शब्द की महिमा को जानना बेहद आवश्यक है। जिस त्रिस्तरीय आरक्षण के जिन्न को बारम्बार देश का अभिजात्य मीडिया और आरक्षण विरोधी जीवित करते हैं,आख़िरकार वो है क्या ?
दरअसल त्रिस्तरीय आरक्षण अभिजात्य और सवर्ण मीडिया द्वारा गढ़ी एक शब्दावली मात्र है,जो आरक्षण की मूल भावना पर चोट करता है। त्रिस्तरीय शब्द का प्रयोग करके अभिजात्य वर्ग वैमनस्य की राजनीति में संलिप्त है। असल में लोकसेवा आयोग,अधीनस्थ आयोग,माध्यमिक आयोग इत्यादि में आरक्षण के नियमों की ही तिलांजलि दी गई है। उक्त आयोगों को किसी भी परीक्षा की प्रक्रिया का निर्धारण और आयोजन का स्वतंत्र अधिकार प्राप्त है,ऐसे में परीक्षा को कितने चरणों में संपन्न कराना है,ये आयोग के स्वविवेक पर निर्भर है। लोकसेवा आयोग की पीसीएस जैसी परीक्षाएं तीन चरणों प्रारंभिक,मुख्य और साक्षात्कार में विभक्त है और इसमें आरक्षण के नाम पर अधिकारों का गलाघोटन होता है। वास्तव में आरक्षण प्रारंभिक स्तर पर मिलना चाहिए,जबकि ऐसा न करके इसको अंतिम स्तर पर साक्षात्कार के दौर में उपलब्ध कराया जाता है और ऐसे में ओबीसी,एससी,एसटी को उनका आरक्षण ही नहीं मिल पाता है।
आरक्षण शब्द मात्र से २०% सवर्णों की पेशानी पर बल पड़ने लगता है,लेकिन असल आरक्षण का लाभ तो वे ही उठा रहे हैं। मंदिरों,मठों,मीडिया,न्यायपालि
बात उत्तर प्रदेश की है,तो यहाँ के ही कुछेक उदाहरण देना ज्यादा बेहतर होगा। त्रिस्तरीय आरक्षण के संघर्ष के दौर में जब समर्थक और और विरोधी अपने-अपने स्तर से लामबंद हुए उनके समर्थन में अनेक नेताओं ने अपने मत दर्ज कराये। उदाहरणस्वरुप आरक्षण विरोधियों के समर्थन में उत्तर प्रदेश की तथाकथित पिछड़ी सरकार के अनेक सवर्ण नेताओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी दर्ज कराई,जिनमे रेवती रमन सिंह,ओम प्रकाश सिंह,रंजना वाजपेयी इत्यादि थी,जो पिछड़ी और दलित बाहुल्य सीटों से चुन कर अपनी राजनैतिक पारियां खेल रहे हैं। दुखद पहलू तो यह था कि जब आरक्षण विरोधियों को अधिकार दिलाने की लड़ाई लड़ने एक पिछड़ा उपस्थित हो गया। उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष और सांसद केशव प्रसाद मौर्या उन महान हस्तियों में है जो आरक्षण प्राप्त तबके से ताल्लुक रखते है,परन्तु राजनीति की गन्दी चालों में खुद को विरोधी साबित कर गौरवान्वित होते हैं। उक्त सवर्ण नेताओं से ज्यादा दोषी तो वे नेता थे जिन्होंने खुद की राजनीति ही पिछड़ा और दलित को छल कर सदैव आबाद की है,इनमे मुलायम,मायावती,अखिलेश तो हैं ही,साथ ही साथ इनकी पार्टी के पिछड़े और दलित नेता भी। इनकी सरकारों के दौर में आरक्षण का हक़ पाने हेतु उत्तर प्रदेश की सड़कों पर लाठियों के दम पर पीटा जाना कितना न्यायसंगत है ?
आरक्षण का जिन्न बारम्बार उठाने वाली सवर्ण और खासकर ब्राह्मण आधिपत्य वाली आरएसएस को बिहार के चुनावों में एक पिछड़े सपूत लालू प्रसाद के हाथों मुंह की खानी पड़ी थी,लेकिन उन्ही के समकक्षीय नेतों मुलायम,नितीश,मायावती,रामबिलास पासवान शायद अपनी जाति और जिल्लत भुला चुके हैं। रामबिलास पासवान के सपूत चिराग के गैरजिम्मेदाराना बयान पासवान के
राजनीतिक चिराग को न बुझा दे क्योंकि स्वयं सुरक्षित सीटों की मलाई खाने वाले इन बाप-बेटों की आरक्षण छोड़ने की नसीहत भविष्य में भारी पड़ सकती है।
अंततः यही कहूंगा कि २०% के हक़ के बदले ८०% के अधिकारों का दमन करने वाली इन तथाकथित सरकारों को खुद के गिरेबां में झाकने की जरुरत है,वरना यदि किसी दिन उनके स्वजातियों ने ही उनका साथ छोड़ दिया तो साउथ एवेन्यू और कालिदास मार्ग दूर की कौड़ी हो जाएगी।
बाकी जो है सो हइये है।

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