Saturday, September 3, 2016

चौकीदार या फिर पूंजीपतियों का मददगार...

विदर्भ में किसान आत्महत्या कर रहे हैं।हरियाणा के मेवात में मामा-मामी के समक्ष दो भांजियों के साथ बलात्कार के पश्चात नृशंस हत्या का नंगा-नाच हो रहा है। नेशनल क्राइम ब्यूरो के आंकड़े मध्यप्रदेश को बलात्कार-प्रदेश की संज्ञा से नवाज रहे हैं।गुजरात में दलित उत्पीड़न का नया इतिहास रचा जा रहा है,जिसकी बदौलत उस प्रदेश की मुखिया को कुर्सी तक गवानी पडी।देश की सरहदों पर बेगुनाह सिपाही बेमौत मर रहे हैं।ऐसे में स्वघोषित चौकीदार बने परिधानमंत्री जी की संघ प्रचारक से जिओ प्रचारक की सफल यात्रा सचमुच विचित्र है।जिस देश की आधी आबादी भूखे पेट आसमानी छत को आशियाना बनाकर रात गुजारती हो,उस देश का मुखिया एक धन्नासेठ की ऐसी गुलामी करे,सचमुच निंदनीय है।जिन मुट्ठियों में खाने का निवाला और रोजगार होना चाहिए,वहां डिजिटल क्रांति का मोबाइल जैसा भ्रमित जुमला छोड़कर किसके हाथों को मजबूत किया जा रहा है?
देश क्रांति मांग रहा है और होनी भी चाहिए क्रांति,लेकिन डिजिटल क्रांति की जगह अगर भूख,गरीबी,बेबसी और लाचारी के लिए ऐसे विज्ञापन या अभियान होते तो शायद राष्ट्र वास्तविक राष्ट्रवाद की ओर बढ़ता ।अगर क्रांति बिजली,पानी,मकान के ७० वर्षीय असफल संघर्ष के साथ-साथ सुशासन,क़ानून,न्याय और समानता जैसे मूल्यों पर होती तो शायद नए युग का नया इतिहास हम लिखने में सफल हो पाते । क्रान्ति यदि माँ-बहनों की अस्मिता के रक्षार्थ होती तो देश कि आधी आबादी के साथ न्याय होता,लेकिन हमे तो डिजिटल क्रांति चाहिए 
अंततः कहूँगा अब भी वक़्त है,अपनी नीति,नियति,सोच और कार्यों में बदलाव लाइए वरना जिंदा कौमे पांच साल इंतजार नही करती 




बाकी जो है सो हइये है।



【चंचल】

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