Wednesday, August 31, 2016

क्या २५ वर्षों में कमंडल से मुक्त हो गया है मंडल?

वर्ण व्यवस्था के दौर में उच्च से निम्न तक का कर्म पाखण्ड और स्वार्थपूर्ति हेतु निर्धारित था।दौर बदला,दायरा बदला, सोच बदली,अगर नही कुछ बदला तो वो थी जाति व्यवस्था।1990 का दौर था,समय करवट ले रहा था,ऐसे में मंडल ने कमंडल को पटखनी दी और समाज के शोषित,अधिकारविहीन और आधी से भी अधिक आबादी को पिछड़ी जाति के रूप में चिन्हित कर 27% का आरक्षण दिया गया।27% के उस अपर्याप्त लेकिन अतिआवश्यक हक़ ने मजलूम,वंचित एवं गरीब पिछड़ों को एक आवाज तो अवश्य ही दी। इस हक़ ने पहले से एकाधिकार प्राप्त अभिजात्य तबके की पेशानी पर बल ला दिया।लेकिन प्रश्न यह है कि क्या उस 27% के अधिकार ने हमारे जिल्लत और जलालत भरे इतिहास को गौरवशाली बना दिया?क्या वे अधिकार हमे पूर्णतः मिले,जिनके हम वाजिब हक़दार थे? शायद नही।2008 में पहली बार पिछड़ों को उच्च शिक्षा में आरक्षण मिला।बमुश्किल 25 वर्षों का अपूर्ण और अपर्याप्त हक़ अभिजात्य वर्ग के सीने में शूल की तरह क्यों चुभ रहा है।उस अभिजात्य वर्ग के जो 5000 वर्षों की शोषण परम्परा का नायक है।वह अभिजात्य वर्ग जो आज भी अघोषित 50% आरक्षण का हक़दार है।जिसने शोषण की न भूलने वाली ऐतिहासिक स्मृतियों से समाज के 80% तबके को सदैव जिल्लत की जिंदगी जीने पर बाध्य किया।
खैर ऐतिहासिकता से इतर मुख्य मुद्दे पर आता हूँ।मंडल अधिकारों की पच्चीसवी वर्षगांठ के उपलक्ष्य में दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में यूनाइटेड ओबीसी फोरम के कुछ जुझारुओं में हक़ और हुकूक की लड़ाई को नई दिशा देने हेतु एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया।मुख्य वक्ता में शरद यादव और अंबुमणि रामदास जैसे बौद्धिक चिंतको को आमंत्रित किया गया। कार्यक्रम के प्रारब्ध में ही वामपंथियों ने हाथापाई का शिकार रामदास को बनाया।उन्ही रामदास को जिन्होंने एम्स में पिछड़ों और दलितों के अधिकारों को दिलाने में एक लंबा संघर्ष किया। दरअसल हाथापाई कर वामपंथी इस आयोजन को असफल करने का कुत्सित प्रयास कर रहे थे।यहाँ एक बात स्पष्ट करता चलूँ कि भारतीय वामपंथ दरअसल ब्राह्मणवाद ही है।यहाँ दिखावट की चादर ओढ़े लोग मार्क्स की आत्मा का प्रदर्शन करते हैं
और फिर जेएनयू तो इनका गढ़ ही है।वही जेएनयू जहाँ कुछ माह पूर्व सत्ताधारी दल के एक नेता कंडोम की गिनती कर रहे थे।उसी जेएनयू में सामाजिक न्याय का एक नया इतिहास लिखने के प्रयास में मंडल आयोग की पच्चीसी मनाई जा रही थी।सफल आयोजन में हुंकार थी,ललकार थी और अधिकारों की मांग थी।
लेकिन पुनश्च प्रश्न उठता है कि वे तथाकथित पिछड़े नेता और पिछड़ी राजनीति वाले राज्य कहाँ हैं,जो ऐसे आयोजन में अपनी परछाई भी दिखाने का साहस नही उठा पा रहे।संभव था कि मंडल के इस महान कृत्य को जनेश्वर मिश्र और ललित नारायण मिश्र से अधिक आँका जाता।लेकिन साहब तथाकथित सोशल इंजीनयरिंग के नाम पर आज देश के तथाकथित पिछड़े नेता शायद अपने वजूद और बुनियाद को भूल गए है।वे भूल गए हैं कि आज जिस सत्ता का नशा उन्हें मदहोश कर रहा है,वास्तव में उसमें मंडल की चाशनी है।मंडल कमीशन के अधिकार तो अधूरे हैं।आइये बाहर मैदान में,क्योंकि आज मंडल कमीशन ने ही आपको 7 आरसीआर या 5 कालिदास मार्ग या 1 अणे मार्ग पर बैठाया है।हक़ और हुकूक की लड़ाई को इन्साफ देने का वक़्त है।ऐसे में युवाओं की जिम्मेदारी बढ़ गयी है।आगे आइये और संघर्ष कीजिये।
अन्ततः रमाशंकर विद्रोही की कुछ पंक्तियों से इस आलेख को विराम दूंगा कि अगर जमीन पर भगवान जम सकता है तो क्या आसमान में धान नही जम सकता। तो एक बार संगठित होकर अधिकारों के इस संघर्ष को नई दिशा दीजिये,क्योंकि अगला इतिहास हमे ही लिखना है।




बाकी जो है सो हइये है।

【चंचल】